Doha
सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई
तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय ।
दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय

Kabir Das was a 15th-century Indian mystic poet and saint, whose writings influenced Hinduism's Bhakti movement and Sikhism.
Kabir Das was a 15th-century Indian mystic poet and saint, whose writings influenced Hinduism's Bhakti movement and Sikhism.
1398–1518
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तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं ।
ते घर भड़धट सारषे, भूत बसै तिन माहिं
कंचन मेरू अरपही, अरपैं कनक भण्डार ।
कहैं कबीर गुरु बेमुखी, कबहूँ न पावै पार
साँई मेरा वाणियां, सहति करै व्यौपार
बिन डांडी बिन पालड़ै तौले सब संसार
गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह ।
कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह
साकट संग न बैठिये करन कुबेर समान
ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान
काज परै कछु और है, काज सरै कछु और
रहिमन भँवरी के भए नदी सिरावत मौर
एक उदर दो चोंच है, पंछी एक कुरंड
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड
पुरुष पूजें देवरा, तिय पूजें रघुनाथ
कहँ रहीम दोउन बनै, पॅंड़ो बैल को साथ
रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जाँचबे योग
ज्यों सरितन सूखा परे, कुआँ खनावत लोग
राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा में हानि
कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि
संपति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार
तेहि निसि आश्रम पिंजाराँ राखे भा भिनुसार